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तुलसीदास जी का रावण वध वर्णन..

आज दशहरे का दिन है. वो दिन जब श्री राम ने रावण का वध किआ था. तुलसी दास जी ने रामचरितमानस में इसका बखूबी चित्रण किआ है. कैसे श्री राम मायावी रावण के वध के समय भ्रमित हो रहे थे. पर विभीषण की मदद से वो रावण की मृत्यु का राज जान पाए



तुलसी दास जी कहते है..

काटत बढ़हिं सीस समुदाई। जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा। राम बिभीषन तन तब देखा॥॥

अर्थात जैसे लाभ होने पर लोभ बढ़ता जाता है उसी तरह से श्री राम रावण के सिर काटते जाते और नए सिर फिर निकल आते. बहुत परिश्रम करने पर भी जब रावण (शत्रु ) नहीं मरा तो श्री राम ने विभीषण की तरफ देखा.. 


नाभिकुंड पियूष बस याकें। नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥
सुनत बिभीषन बचन कृपाला। हरषि गहे कर बान कराला॥॥

विभीषण के कहा, इसके नाभिकुंड में अमृत का निवास है. हे नाथ! रावण उसी के बल पर जीता है. विभीषण के वचन सुनते ही कृपालु श्री रघुनाथजी ने हर्षित होकर हाथ में विकराल बाण निकाल लिए. 


असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना॥
बोलहिं खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू॥॥

उस समय अनेको प्रकार के अपशकुन होने लगे. बहुत से गधे, सियार और कुत्ते रोने लगे. जगत्‌ के दुःख (अशुभ) को सूचित करने के लिए पक्षी बोलने लगे. आकाश में जहाँ-तहाँ केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गए. 

खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस, रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥

कानों तक धनुष को खींचकर श्री रघुनाथजी ने इकतीस बाण छोड़े. वे श्री रामचंद्रजी के बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों. 

सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥
लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥॥

एक बाण ने नाभि के अमृत कुंड को सोख लिया. दूसरे तीस बाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओं में लगे. बाण सरो और भुजाओं को लेकर चले (काट दिए) और सर और भुजाओं से रहित रुण्ड (धड़) पृथ्वी पर नाचने लगा.

धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा। तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥
गर्जेउ मरत घोर रव भारी। कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥॥

रावण का धड़ प्रचण्ड वेग से दौड़ता है, जिससे धरती धँसने लगी. तब प्रभु ने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिए. मरते समय रावण बड़े घोर शब्द से गरजकर बोला- राम कहाँ हैं? मैं ललकारकर उनको युद्ध में मारूंगा.

डोली भूमि गिरत दसकंधर। छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥
धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई। चापि भालु मर्कट समुदाई॥॥

रावण के गिरते ही पृथ्वी हिल गई. समुद्र, नदियाँ, दिशाओं के हाथी और पर्वत क्षुब्ध हो उठे. रावण धड़ के दोनों टुकड़े फैलकर भालू और वानरों के समुदाय को दबाते हुए पृथ्वी पर गिर पड़े.

बरषहिं सुमन देव मुनि बृंदा। जय कृपाल जय जयति मुकुंदा॥॥

रावण के वध को देखकर देवता और मुनियों के समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं- कृपालु की जय हो, मुकुन्द की जय हो, जय हो!

बोलो सियापति राम चंद्र की जय..



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