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#CleanUpCashOut एक तीर से दो निशाने [कहानी]

"जाने क्या तूने कही.. जाने क्या मैंने कही.. बात कुछ बन ही गई.." 
ऐसा ही कुछ हुआ मेरे साथ पिछले महीने. वैसे शुरुवात एक ट्रेजेडी के साथ हुई पर अचानक ही ट्रेजेडी ने अच्छा मोड़ ले लिया और फिर "अंत भला तो सब भला..."

हुआ यूँ कि मैं अपने पुराने फ़ोन से काफी उकता गया था और नया फ़ोन लेने की सोंच रहा था. वैसे फ़ोन उतना भी पुराना नहीं था पर रोज रोज आते नए फ़ोन मॉडल्स मुझे एक बार फिर नया फ़ोन लेने के लिए मज़बूर कर रहे थे. " लेकिन इस पुराने फ़ोन का क्या होगा..?" ये सवाल मेरे दिमाग में कीड़े की तरह काट रहा था.  काफी सोंच विचार के बाद जब दिमाग थक गया तो मैं घर की बालकनी में खड़ा हो गया जा कर. इधर उधर देखते ही मेरी नज़र बगल की बालकनी में खड़े साहिल भैया पर गई. साहिल भैया हमारे पड़ोसी है और हमारी बालकनिया आमने सामने है. वो उम्र में मुझसे बड़े है और सच कहू तो थोड़े खड़ूस भी है. अचनाक ही ख्याल आया कि क्यों ना ये पुराना फ़ोन साहिल भैया को बेच दू!! पर उनसे बात करना भी एक टेढ़ी खीर थी. वो कभी सीधे मुँह किसी से बात नहीं करते. मैंने मन को मज़बूत किआ और फ़ोन साहिल भइया को ही बेचने को सोचा. अगले दिन संडे था. मैंने सुबह चाय पीते पीते पीते एक प्लान बनाया कि कैसे साहिल भइया को जाल में फसाया जाए. चाय खत्म होते ही मैंने प्लान पर एक्शन ले लिया. लगातार बालकनी के चक्कर लगाए कि बस साहिल भइया दिख जाए एक बार. दिन में करीब २ बजे वो बालकनी में दिखाई दिए. मैं भी अपना पुराना फ़ोन लेकर अपनी बालकनी में खड़ा हो गया और साहिल भइया से बात करना शुरू की.

"हेलो साहिल भैया.." मैं अपनी बालकनी से जोर से बोला.. साहिल भैया ने एक जबरदस्ती वाली मुस्कान दी पर बोले कुछ भी नहीं. 

२ मिनट बाद मैंने खुद ही एक सवाल और किआ साहिल भैया से "साहिल भैया आपने ये Sarahah App देखा..? " 

साहिल भैया ने चिढ़ते हुए जवाब दिया "नहीं.."! 

मैं फिर से बोला "बड़ी मस्त App है ये.." और इतना बोलकर मैं अपने फ़ोन को देखते हुआ बनावटी हसीं हसने लगा. 

बस साहिल भैया फ़स गए जाल में. उन्होंने मुझसे पूछा "कैसा App है ये..? क्या करती है..?" 

मैंने उचक कर कहा "शाम को आप नीचे मिलना, आपको दिखाता हूँ.."

शाम को ६ बजे साहिल भैया नीचे सोसाइटी पार्क में दिखे. मैं तुरंत फ़ोन लेकर नीचे उनके पास पहुंच गया. उन्हें App दिखाई और बताया कि कैसे इससे किसी को भी मैसेज कर सकते है. साहिल भैया का मुँह देख कर मैं समझ गया कि उन्हें App पसंद आ गई. मैंने उन्हें App इनस्टॉल करने के लिए कहा. 

"अरे यार.. मेरा फ़ोन ख़राब है.. इसी बेसिक फ़ोन से काम चला रहा हूँ आज कल.." अपना बेसिक कीपैड फ़ोन मुझे दिखाते हुए साहिल भैया बोले. 

मैंने भी सांत्वना देते हुए कहा "फिर आप कैसे इनस्टॉल कर पाओगे App!!" इस तरह मेरी साहिल भैया से बात चीत शुरू हो ही गई.

२ दिन बाद जब फिर से वो सोसाइटी कंपाउंड में मिले तो मैंने उन्हें जान बूझ कर बताया कि मैं नया फ़ोन लेने की सोंच रहा हूँ. 

साहिल भैया बोले "वाह बेटे.. मेरे पास तो ये नॉन स्मार्ट फ़ोन ही है और तू एक और स्मार्ट फ़ोन लेने वाला है.." 

मैंने बड़े प्यार से बोला "भैया आप भी अब ले लीजिये ना स्मार्ट फ़ोन. आजकल ये कीपैड वाले फ़ोन कौन यूज करता है??" 

निशाना सही जगह लग गया था. साहिल भैया बोले "कोई सेकंड हैंड फ़ोन पता चले तो बताना. नया फ़ोन अभी नहीं लेने के मूड में हूँ. इससे पहले वाला फ़ोन मेरी ही लापरवाही से टूटा था.." मैंने भी हां में जवाब दिया कि बताऊंगा. 

अगले दिन जैसे ही साहिल भइया बालकनी में दिखे मैंने तुरंत ही उनसे कहा "साहिल भैया मैं सोंच रहा था कि क्यों ना मैं अपना फ़ोन आपको ही बेच दू..? आपको स्मार्ट फ़ोन मिल जाएगा और मैं तो नया लेने ही वाला हूँ तो इस पुराने फ़ोन की भी थोड़ी इज्जत रह जाएगी .." 

साहिल भैया थोड़ी देर चुप रहे. मुझे लगा ये कंजूस फ़ोन नहीं लेगा क्या? 
पर फिर वो बोले "ठीक है दिखा अपना फ़ोन.. पसंद आया तो ले लूंगा.. " 

मैं तो एकदम बाग बाग हो गया. अपने आप को शाबाशी देने लगा कि क्या प्लान बनाया था मैंने..एकदम सही साबित हुआ.

उसी दिन शाम को मैं सिम कार्ड निकाल कर साहिल भैया के पास फ़ोन देने गया. मुझे देखते ही वो बोले "कितने में देगा फ़ोन..? " 

मैंने भी बड़े आदर से जवाब दिया "आपसे जितना बने दे दो..मुझे ऐसा कोई बड़ा रेट नहीं चाहिए.." 

साहिल भैया मुझे वही रहने का बोल कर अपने घर की तरफ गए. १० मिनट बाद वो एक ATM कार्ड लेकर आए और सोसाइटी के ATM से मुझे ५ हज़ार रूपये निकाल कर दे दिए. 

"इतने ही दूंगा.." बोलकर साहिल भइया ने मुझसे फ़ोन छीन लिया. 

मेरी तो लॉटरी लग गई थी. साहिल भैया को थैंक यू बोल मैं तुरंत अपने लिए नया फ़ोन लेने चल दिया. घर वापस आया तो मेरे हाथो में मेरा नया फ़ोन था. मैं फेसबुक पर अपने स्टेटस में नए फ़ोन के बारे में लिखने लगा. लोगो के कमैंट्स भी आने लगे "बधाई हो.." , "फिर से नया फ़ोन..?", "तू कितने फ़ोन लेता है यार.."

रात बड़े अच्छे से गई नए फ़ोन के साथ. अगले दिन ऑफिस में भी सब नए फ़ोन के बारे में पूछ रहे थे. मैं भी ५६ इंच के सीने के साथ सबको फ़ोन के फीचर्स बता रहा था. शाम को घर पहुंच कर मैंने चाय बनाई और बालकनी में कप लेकर खड़ा हो गया. बगल की बालकनी में नज़र दौड़ाई तो साहिल भैया की सुन्दर बहन प्रीती खड़ी थी. साहिल भैया जितने खड़ूस है, प्रीती उतनी ही अच्छी. सोसाइटी के काफी लड़के उसके दीवाने थे. मुझे भी वो पसंद थी पर कभी कुछ कहने की हिम्मत नहीं हुई. साहिल भैया रोज जिम में ४ घंटे लगाते है. कही प्रीती ने शिकायत कर दी उनसे तो साहिल भैया पक्का मुझे पीट देंगे इस डर से मैंने कभी भी प्रीती से सीधे बात नहीं की. बस बालकनी से ही उसे देखता था. उस दिन प्रीती को देखते देखते ही याद आया कि मेरे पुराने फ़ोन में प्रीती की फोटोज भी थी जो मैंने चुपचाप बालकनी से ही ली थी. मेरे तो होश फाख्ता हो गए. वो फ़ोन अब साहिल भैया के पास था. उन्हें देने की जल्दी में मैं मेमोरी कार्ड भी निकालना भूल गया था. मैं सोचने लगा अगर साहिल भैया ने वो पिक्स देख ली तो वो मेरी चटनी बना देंगे. डर से पसीना पसीना हो गया मैं. पर हिम्मत करके उनसे मेमोरी कार्ड मांगने का सोचा. मैंने साहिल भैया को फ़ोन किआ. घंटी जाते ही मैं मन ही मन भगवान को याद करने लगा. 

साहिल भैया ने फ़ोन उठाया और बोले "क्या हुआ.. फ़ोन क्यों किआ..?". 

मैंने कापते हुए बोला "भैया, फ़ोन में मेरा मेमोरी कार्ड लगा रह गया है.. वो मुझे वापस चाहिए.." 

साहिल भैया ने हॅसते हुए जवाब दिए "अबे.. अब वो नहीं मिलने वाला.. फ़ोन अब मेरा हो चुका है.."


खैर थोड़ी देर में साहिल भैया ने मेमोरी कार्ड ले जाने को बोला. उनकी आवाज से ऐसा लग नहीं था कि उन्हें प्रीती की फोटोज़ दिखी फ़ोन में. मैं तुरंत नीचे पंहुचा और उन्हें कॉल करके नीचे आने को कहा. साहिल भैया ने मुझे ऊपर उनके घर आने को कहा. मैं थोड़ा डरा कि कही ये घर बुला कर पीटने की साजिस तो नहीं..? पर मैं फिर से हिम्मत जुटाकर उनके घर पंहुचा. बेल बजायी घर की तो प्रीती ने दरवाजा खोला. मुझे देखकर वो मुस्कुराई और फिर अपने कमरे में चली गई. 

साहिल भैया की आवाज आई "आ भाई. ले ले मेमोरी कार्ड.." 

मैंने तुरंत मेमोरी कार्ड निकला और उन्हें थैंक यू बोल कर अपने घर वापस आ गया. फिर मैंने नए फ़ोन में मेमोरी कार्ड लगाया और प्रीती की फोटोज देखने लगा. कुछ तो फोटोज ठीक थी पर कुछ के साथ मैंने अपने कलाकारी भी दिखाई थी. उन्हें एडिट करके हार्ट वाले स्टीकर लगा रखे थे. शुक्र था साहिल भैया ने फोटोज नहीं देखी. मैंने उन्हें सेव भी काफी फ़ोल्डरों के अंदर किआ था. आसानी से वहाँ पहुंचना नामुमकिन था. उस फोल्डर ना नाम था "भजन".. 

कुछ देर बाद मेरे व्हाट्सप्प पर एक रिक्वेस्ट आई "हाई.. मी प्रीती.." 
अरे ये क्या हुआ?कैसे हुआ? प्रीती ये तो साहिल भैया की बहन प्रीती थी. मैंने रिक्वेस्ट एक्सेप्ट की और उसे हेलो भेजा. 

उसने लिखा "थैंक यू फॉर क्लिकिंग माई पिक्स.. " साथ में एक स्माइली था.

असल में साहिल भैया मेरा पुराना फ़ोन लेकर घर पहुंचे तो प्रीती ने भी फ़ोन देखा. मेरी किस्मत अच्छी थी कि साहिल भैया प्रीती की फोटोज वाले फोल्डर तक नहीं पहुंच पाए और मैं मेमोरी कार्ड ले आया वापस. पर इस बीच प्रीती ने देख लिया था वो फोल्डर  "भजन" जिसमे उसकी ही फोटोज थी. एक तीर से दो निशाने लग गए थे. फ़ोन मैंने साहिल भैया को बेच दिया था और प्रीती मेरी दोस्त बन गई थी. दोस्त से थोड़ी ज्यादा वैसे..

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(इमेजस : साभार निर्माता)
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