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#CelebratingSuper झोला लेकर आया करो बाबू जी..

दिल्ली को दिलवालो की दिल्ली कहा जाता है. दिलवाले मतलब मस्तमौला लोग जो दुनियादारी से दूर है और दिल से मज़बूर है. पर पिछले ६ सालो से दिल्ली में रहने के बाद मुझे थोड़ी शिकायत सी है इस कहावत से. ये बात दिल्ली में रहने वाले सारे लोगो के लिए नहीं है पर काफी सारे दिल्ली के दिलवाले दिल्ली को अच्छा और सुन्दर रखने के बारे में ज़रा भी नहीं सोचते. गंदगी, प्रदूषण और शोर की कोई कमी नहीं है अब अपनी दिल्ली में. पर शुक्र है कुछ लोग अब भी दिल्ली को अच्छा, सुन्दर और स्मार्ट बनाने में लगे है. अब वोडाफोन को ही देख लीजिये. कितने ही नए कदम उठाए है दिल्ली को बेहतर बनाने के लिए. १२० के करीब मुफ्त wifi  ज़ोन्स दिए है वोडाफ़ोन ने  दिल्ली-NCR में जहाँ लोग मुफ्त इंटरनेट का मज़ा ले सकते है, चाहे वो वोडाफोन उपभोक्ता है या नहीं. वोडाफोन के बारे में और जानने के लिए ये लिंक देखे https://www.vodafone.in/home-delhi

पर क्या आपको पता है की वोडाफ़ोन ने दिल्ली-NCR में पहला एयर पूरिफाइंग बस स्टैंड बनवाया है जिससे कि बस का इंतज़ार कर रहे लोग शुद्ध हवा में साँस ले?  दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण से काफी जगहों पर हवा की स्तिथि काफी ख़राब है.और उसी हवा में साँस लेना ना जाने कितनी भी बीमारियों को न्योता दे रहा है. साल दर साल बढ़ते प्रदूषण से काफी लोग फेफड़ो से सम्बंधित समस्याओ से पीड़ित हो रहे है. सरकार ने भी थोड़ा ही सही पर कुछ ध्यान दिया है इस बात पर. ट्रैफिक ऑड-इवन नियम और हाल में लगाया गया पटाखों पर प्रतिबन्ध इसी वजह से था. पटाखों से याद आया कि दिल्ली के लोगो ने इस प्रतिबन्ध की तरफ ज्यादा ही दिल लगा लिया. लोग नाखुश थे इससे. दिवाली के दिन खूब पटाखे चले और प्रदूषण और बढ़ गया. दिल्ली के दिलवाले ये समझ नहीं पाए कि ये प्रतिबन्ध उन्ही की सेहत को देखते हुए लगाया गया था. पर लोग नहीं माने. खूब बवाल और राजनीती हुई और हवा में ज़हर घोल ही दिया पटाखेबाज़ो ने. 

ये प्रतिबन्ध तो ना चल पाया पर मैं एक और प्रतिबन्ध के बारे में बात करने जा रही हूँ जो सफल होता सा जान पड़ रहा है. प्लास्टिक पॉलिथीन का प्रतिबन्ध. वैसे तो ये प्रतिबन्ध काफी समय पहले ही दिल्ली में लगा दिया गया था. पर लोग फिर भी खुलेआम पॉलिथीन का इस्तेमाल कर रहे थे. मॉल्स और बड़ी दुकानों ने तो ग्राहकों को कपड़े या कागज के बने थैले देने शुरू कर दिए थे काफी समय पहले ही. पर छोटे दूकानदार, फल और सब्ज़ी वाले धुआंदार तरीके से पॉलीबैग का इस्तेमाल कर रहे थे. १० अगस्त को एक अच्छे कदम के तहत NGT (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) ने ५ माइक्रोन से पतली पॉलिथीन के इस्तेमाल पर एकदम रोक लगा दी. और साथ ही साथ इसका पालन ना करने पर ५ हज़ार का जुर्माना भी रखा. अब नियम तो बनते ही रहते है पर लोग कहा उनका पालन करते है!! लेकिन जब मैंने खुद इस प्रतिबन्ध का कड़ाई से पालन होते देखा तो बड़ा अच्छा लगा. 

कुछ दिनों पहले मैं अपने एक परिचित की दुकान में ऐसे ही उनसे मिलने गई. मैंने देखा कि भाभी सब ग्राहकों हॅंस कर किसी चीज के सॉरी बोल रही थी. तो मैंने उनसे पूछ ही लिया  ऐसा क्यूँ और जो पता चला वो अच्छा लगा सुन कर! एक दिन पहले ही जांच करने वाले आए थे कि कही उनकी दुकान में पॉलिथीन का इस्तेमाल तो नहीं हो रहा, और क्यूकि हो रहा था पॉलिथीन का इस्तेमाल तो जांच करने वाले ५ हज़ार का जुर्माना लगा गए थे उन्हें. इसलिए भैया-भाभी  ने कपड़े के थैले में सामन देना शुरू कर दिया है ग्राहकों को. पर १०० रूपये से कम के सामान पर भाभी हॅंस कर सबको सॉरी बोल देती है थैला ना देने के लिए और साथ ही अगली बार घर से थैला लाने को भी कहती है. धीरे धीरे लोग भी समझ रहे है कि अब पॉलीबैग में सामान नहीं मिलेगा. 


ये असर सब्ज़ी और फल वालो में भी है. दिल्ली में मैं जहाँ रहती हूँ वहाँ के लगभग हर सब्ज़ी वाले ने पॉलीबैग में सब्ज़ी देना बंद कर दिया है. और जो दे भी रहे है उनके पास पॉलीबैग का लिमिटेड स्टॉक है. सब्ज़ी और फल वालो के लिए ५ हज़ार एक बड़ी राशि है. और जब उन्होंने एक-दो सब्ज़ी वालो पर जुर्माना होते देख लिया तो सब खुद ही सजग हो गए. डर से सही पर पॉलिथीन का इस्तेमाल बंद हो रहा है धीरे धीरे दिल्ली में. NGT ने ये जो  पॉलिथीन पर प्रतिबन्ध लगाया है इसमें ये भी कहा गया है कि अगर सब्ज़ी वाले और बूचड़ खानो से पॉलिथीन में भर कर कूड़ा फेका जाएगा सार्वजनिक जगहों पर तो उन पर १० हज़ार से ज्यादा तक का जुर्माना लग सकता है. वैसे अभी इस बारे में किसी से सुना नहीं कि अमल में लाया गया है ये नियम भी, पर सब्ज़ी वालो के लिए ५ हज़ार वाला जुर्माना भी कड़ा है. पॉलिथीन से पर्यावरण को होने वाले नुक्सान से सभी परिचित है. कितना ही कहा और सुना गया पॉलिथीन का इस्तेमाल कम करने के लिए पर लोग है कि मानते नहीं!! ये नया नियम काम कर रहा है और मेरे जैसे आम आदमी (पार्टी वाला नहीं, सच में) ये नियम लागू होता देखे तो सरकार को बधाई देने का मन हो जाता है. उम्मीद बन जाती है कि दिल्ली बदल सकती है. देर आए दुरुस्त आए.. 

अब हमारी गली के सब्ज़ी वाले भैया हर किसी को यही बोलते है "घर से झोला लेकर आया करो बाबू जी..पॉलिथीन में सामान देकर हमे लुटना नहीं है.." वैसे झोले में सब्ज़ी लाने का अपना मज़ा है..जैसे बचपन में अम्मा लाती थी और उनके बाजार से वापस आते ही हम झोले में झाँकने लगते थे कि कुछ अच्छा आया क्या? अच्छा  मतलब बाजार में आने वाले गरी (नारियल) के गोले और गुड़ वाले सेव.. क्या दिन थे वो बचपन के..


(ब्लॉग चित्र: साभार निर्माता)

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