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अपने लिए जिए..

अभी कुछ दिनों पहले आई एक खबर ने हम सब के रोंगटे खड़े कर दिए. आशा साहनी नाम की एक ६३ साल की वृद्ध महिला अपने घर में मृत पाई गई. मुझसे तो ठीक से वो न्यूज़ सुनी भी नहीं गई. अकेलेपन की शिकार आशा साहनी ने एक साल से अपने बेटे से बात भी नहीं की थी. वो अपने फ्लैट में अकेले ही रहती थी पति की मृत्यु के बाद से क्युकी बेटा US चला गया था अपने परिवार के साथ. आशा साहनी एक संभ्रांत महिला थी. जिस सोसाइटी में वो रहती थी उसमे ५-६ करोड़ की लागत के दो फ्लैट थे उनके पास. पर सबकुछ होने के बाद भी परिवार का साथ नहीं था. 

फिर एक और खबर मिली जिसने मुझे सोचने पर मज़बूर कर दिया. करोड़पति विजयपत सिंघानिया सड़को पर आ गए है और इसके लिए वो अपने बेटे को जिम्मेदार बता रहे है. ७८ साल के विजयपत सिंघानिया अपने देश के कुछ जाने माने संभ्रांत लोगो में से थे जिन्होंने रेमंड नाम के कपड़ो के ब्रांड को लोगो तक पहुंचाया. 12 हजार करोड़ रुपये की मालियत वाले रेमंड ग्रुप के मालिक विजयपत सिंघानिया को उनके बेटे ने पैसे-पैसे के लिए मोहताज कर दिया. आजकल वो किराये के एक घर में रह रहे है, बीमार है, कार नहीं है कही आने जाने के लिए और बेटे के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ रहे है.

इन दोनों ही खबरों में एक अजीब सी समानता और डरावना पन दिखता है मुझे. विजयपत सिंघानिया और आशा साहनी, दोनों ही अपने बेटों को अपनी दुनिया समझते थे और दोनों को ही बेटो ने इस अंजाम तक पहुंचाया. दोनों ने ही अपने बेटो को पढ़ा लिखा कर काबिल बनाया पर दोनों के ही बेटो ने इस बात को नज़रअंदाज कर अपने जन्मदाता को अकेला कर दिया उस समय जब उन्हें उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी. 

सोशल मीडिया के इस युग में खबरों की सच्चाई का कुछ कहा नहीं जा सकता है. कही मैंने ये भी पढ़ा कि आशा साहनी का बेटा उन्हें अपने साथ  US में रखना चाहता था पर वो मानी नहीं और अकेले रहने लगी. कही ये तक लिखा था कि क्युकी आशा साहनी ने अपने पहले पति कि मृत्यु के बाद दूसरी शादी कर ली थी इसलिए माँ बेटे के बीच तनाव था. पर २०१३ में आशा साहनी के दूसरे पति की भी मृत्यु हो गई और तब वो अपकेलेपन की शिकार थी. वही दूसरी तरफ विजयपत सिंघानिया ने खुद ही सारी सम्पत्ति बेटे के नाम की थी. मैंने ये पढ़ा कि उनके और बेटे के बीच की लड़ाई का कारण JK हाउस था जो कि विजयपत सिंघानिया का १४ मंजिला घर हुआ करता था. JK हाउस में किसको क्या मिलेगा इसको लेकर पिता और बेटे में मतभेद के बाद बेटे ने सब सम्पतियो से पिता को अलग कर दिया. 

अब इस दोनों घटनाओ के डरवानेपन की बात करते है. विजयपत सिंघानिया और आशा साहनी दोनों अपने बेटो को पढ़ा-लिखाकर उन्हें अपने से ज्यादा कामयाबी की बुलंदी पर देखना चाहते थे. हर मां, हर पिता की यही इच्छा होती है. मेरी भी यही है और शायद आपकी भी यही होगी. विजयपत सिंघानिया ने समय आने पर अपना सबकुछ अपने बेटे के नाम कर दिया ये सोच कर कि बेटा पिता का नाम और रौशन करेगा. आशा साहनी ये भी ऐसा ही सोचा होगा तभी तो बेटा इस लायक बना कि विदेश ने बस जाए. दोनों के ही सपने कुछ हद तक पूरे भी हुए पर फिर आशा साहनी कंकाल क्यों बन गई? विजयपत सिंघानिया आज दर-दर की ठोकरे क्यों खा रहे है? उन दोनों से ही क्या भूल हो गई?

एक ऐसी सच्चाई जो मुझे आज कल की परवरिश में मिलती है वो है माता पिता का अपने बच्चो के लिए जीना. वो पूरी दुनिआ से अलग हो बस अपने बच्चो की तरफ ध्यान देते है. उनकी अच्छी पढाई और तरक्की के सपने देखते-देखते कट जाते है बाकी रिश्तेदारों और दोस्तों से. पहले जरा आजकल ही जिंदगी पर नज़र डालते है. बचपन में ढेर सारे नाते रिश्तेदार, ढेर सारे दोस्त, ढेर सारे खेल-खिलौने पर थोड़े बड़े हुए तो पाबंदियां शुरू.फिर आँखों में कामयाबी के सपने और उनको पूरा करते-करते कब परिवार हाथ से छूट जाता है पता ही नहीं चलता. देश रास आना बंद होने लगता है, अब विदेशो में बस ज्यादा ही सफलता का मानक है. फिर अपना निजी घर, अपना छोटा परिवार और बाकी लोगो की एंट्री बंद. यही तो है शहरी जिंदगी आजकल. पडोसी एक दूसरे का नाम नहीं जानते, और जानना भी नहीं चाहते. वही एक डायलॉग "हम तो अपने बच्चो के लिए जी रहे है.. बाकियो के क्या मतलब.."

अब मुझे ये डायलॉग की डरवाना लगने लगा है. बस बच्चो के लिए जीना और बाकी दुनिया से कट जाना. अगर यही जिंदगी का मकसद है आजकल के माता पिता का तो बच्चो के कामयाब होने के बाद उनके जीने का क्या मतलब? क्यों जिए वो सब सारे सपने पूरे हो जाए? कही बच्चो की कामयाबी में अच्छे बुढ़ापे का छुपा हुआ मकसद तो नहीं है, जो बच्चो को पता ही ना हो?अगर नहीं तो फिर आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया को शिकायत कैसी? दोनों के बच्चे कामयाब हैं, दोनों अपने बच्चों के लिए जिए, तो फिर अब उनका काम खत्म हो गया, जीने की जरूरत क्या है?

मुझे पता है काफी लोग सहमत नहीं होंगे इस बात से पर मैं ये बताना चाहती हूँ कि बच्चो के लिए जीते जीते माँ पिता अपने लिए जीना भूल जाते है और उनमे से कुछ आशा साहनी और विजयपत सिंघानिया बन जाते है. राजेश खन्ना की एक फिल्म थी "अवतार" उसमे भी तो यही दिखाया गया था. बच्चो से धोखा खाने के बाद अवतार किशन फिर से खुद के लिए जीना का मकसद बनाते है और फिर एक सुखद अंत. और हाल ही की फ्लिम "बागबान" अमिताभ बच्चन वाली. ना जाने कितने की वृद्ध माता पिता ने खुद को अमिताभ बच्चन और हेमा मालनी की जगह पाया होगा. पर फिर राज मल्होत्रा का एक कदम उन्हें दोबारा चाँद सितारों पर पंहुचा देता है और बच्चे फिर से उनके पास वापस आने की बात करते है. 

पर असल जिंदगी और फिल्मो में यही तो अंतर है. अवतार के राजेश खन्ना का वफादार सेवक सचिन पिलगाओंकर उनका साथ देता है और चीजे फिर से ठीक हो जाती है. उसी तरह बागबान में परेश रावल का रोल भले ही छोटा लगता हो पर वो ना होते तो अमिताभ बच्चन अपनी किताब कैसे लिखते और फिर से कामयाब हो पाते. असल जिंदगी में सबके पास ऐसा कोई वफादार सेवक या अच्छा दोस्त हो जो बुरे वक्त में काम आए, सूखे पौधों में पानी डाले और बिना किसी उम्मीद के मदद करे, ऐसा जरूरी नहीं.  

कुछ चीजे जो मैं अभी से गाँठ बांध रही हूँ आपसे भी कहना चाहती हूँ. अपने लिए जिए, अपने सपनो को बच्चो की सफलता तक सीमित ना करे, आगे की भी सोचे, परिवार और रिश्तेदारों को महत्व दे. अपने घर की बगिया में बाहर के लोगो की एंट्री बंद ना करे. बच्चो को पढाई के लिए प्रोत्साहित करे पर त्योहारों पर दादी नानी के घर जरूर जाए. अपने से दूर रहने वाले वृद्ध माता पिता से रोज बाते करे अगर साथ नहीं रह सकते तो. उन्हें ये एहसास ना होने पाए की वो अकेले है. ध्यान रखिये आप जिंदा रहेंगे तो बच्चे भी जिंदा और पास रहेंगे. खुद ही पहचान को बच्चो की नौकरी के बाद मत बदलिए. अपना सबकुछ उनके नाम करने से पहले ये जरूर सोचिये की बेटा या बेटी नालायक निकले तो..? खुद का बुढ़ापा प्लान कीजिये और अपेक्षा किसी से भी मत कीजिए, क्योंकि अपेक्षाएं ही दुख का कारण हैं. 

कुछ हिस्से विकास मिश्रा के फेसबुक पोस्ट से प्रेरित 
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