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#MothersDay माँ..ईश्वर की खूबसूरत नियामत


मुझे बचपन में दूध बिल्कुल पसंद नहीं था अपनी माँ की तरह। माँ जबरदस्ती एक गिलास दूध हम चारों भाई बहनों को देती थी। मेरी दादी भी हमारे साथ रहती थी। उन्हें दूध और दही बहुत पसंद था तो वो सुबह शाम इसके मजे लेती थी। मेरे पापा को खाने के आखिर में थोड़ा सा चावल दूध और चीनी के साथ खाना बहुत रहा। माँ को उनकी जबरदस्ती के लिए बहुत उलाहना देती थी मैं।

मेरी शादी के बाद जब मेरे माँ पापा पहली बार मेरे पास आये तो मैंने ख़ालिस दूध की चाय बनायी। माँ खुश हो गयी। दोपहर के खाने में मैंने दही भी परोसी। पापा, अपने पति और अपने लिए कटोरी भर दही और माँ के लिए थोड़ी सी। मेरे पति बोले ‘मम्मी जी के लिए बस इतनी सी दही’! मैंने गर्व से अपना ज्ञान झाड़ा ‘मम्मी को दही पसंद नहीं है’। इस पर पापा बोले ‘नहीं बेटा, मम्मी को तो सुबह शाम दही चाहिये’। मैंने हैरानी से माँ की तरफ देखा और माँ बस मुस्कुरा दी।
मैंने बाद में अकेले में माँ से पूछा ’अब तुम्हें दही पसंद आने लगी?’ माँ ने कहा ‘बेटा, दही तो मुझे हमेशा से पसंद थी। लेकिन चार बच्चे, तुम्हारी दादी और पापा के लिए कहीं कम न पड़ जाए इसलिए मैं नहीं खाती थी। तब पापा की तनख्वाह भी कम थी। केवल दादी को शुद्ध दूध मिलता था। तुम लोगों के दूध में तो आधा दूध और आधा पानी होता था। ऐसे मैं मेरा मन नहीं मानता था कि खुद दूध दही में हिस्सेदारी करके तुम लोगों का हिस्सा कम करूँ।‘ मैं उस समय कैसा महसूस कर रही थी यह लिखना संभव नहीं है मेरे लिए। आँखों में आँसू झिलमिला गए मेरे और अचानक माँ को दिए अपने सारे उलाहने कानों में गूँज गए। क्यूंकि जब से जॉब शुरू की मैंने सुबह का नाश्ता सिर्फ़ दूध ही होता है। मैं हैरान होती थी कि दूध मुझे पसंद कैसे आ जाता है! इस दूध में आधा पानी जो नहीं होता था यह बात आज समझ आई।
यह समझ आया कि कैसे माँ सीमित साधनों में अपने बच्चों की हर ज़रुरत पूरी करने की कोशिश करती है। कैसे माँ सालों तक बच्चों को वहम में रख सकती है! बमुश्किल मैंने आँसू रोककर पूछा ‘अब तुम दूध भी पीती हो?’ माँ ने कहा ‘हाँ, रात को सोने से पहले एक गिलास पी लेती हूँ’। मैं माँ से लिपट गयी क्यूंकि अब मुझसे मेरे आँसू नहीं रुक रहे थे। माँ से लिपट कर मैं सोच रही थी न जाने और क्या क्या बातें हैं जो मैं माँ के बारे में नहीं जानती। पता नहीं कौन कौन सी इच्छायें और शौक उन्होंने अपने अन्दर ही मार डाले और किसी को पता भी नहीं चलने दिया। मेरे लिए यह मातृत्व का एक पहलू है जो मैने उस दिन जाना। पूरी तरह तो शायद कोई भी माँ या उसके मातृत्व को बूझ ही नहीं सकता। माँ और मातृत्व ईश्वर की वो खूबसूरत नियामत हैं जो इस दुनिया को अपने अथाह प्रेम से सींचती आ रही हैं।
~ हेमा 
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