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Showing posts from February, 2017

कुछ बीज नए तो कुछ पुराने..

हमारे घरो में ये आम बात है कि छोटे बच्चे सोने से पहले कहानी या लोरिया सुनते है अपनी माँ से. मेरा घर भी कुछ अलग नही है. बस मेरे घर में हम दोनों पति पत्नी मिलकर ये काम करते है. मुझे गाने का शौक है और अच्छी बात ये है कि मेरे पतिदेव को भी यही कीड़ा है. हमारा झुकाव पुराने फ़िल्मी गानों की तरफ ज्यादा है. पर सबसे ज्यादा जो हमें पसंद है वो है लोक गीत जिन्हें हम आम भाषा में folk songs बोलते है. अवध से आने की वजह से ये लोक गीत अच्छे से रचे बसे है हमारी सोंच में. हमारे यहाँ शादी या किसी और शुभ काम में लोक गीत गाना आम है. मेरी माँ और सासू माँ दोनों ही अच्छा गाती है. मुझे बड़ा अच्छा लगता है जब हम अपना इतिहास गीतों के माध्यम से याद करते है. और हमारे यहाँ किसी देवी या देव की पूजा भी बिना गीतों के पूरी नही होती. पतिदेव के ननिहाल में सब लोग ही अच्छा गाते है जिसका काफी असर है उनके ऊपर. मुझे तो स्कूल के समय से ही अच्छा लगता था गाना. इन्ही वजहों से हम दोनों को ही कई लोक गीत आते है. 


वैसे आज के ज़माने में लोग कजरी, चैती, दादरा, बन्ना जैसे लोक गीत ना सुनते है और ना ही सुनाते है. पर हमने अपने घर में ये विरासत बन…

So You Don't Believe In Valentine's Day..

As valentine’s day approaches every year, with comes a flood of blogs/posts with titles like “Every Day is Valentine’s Day”, “Love is eternal, not made for a single day” and many other similar ones criticizing the celebration of Valentine’s day to some extent. Well, I have no problem with the message that these blogs try to convey. I also believe that Love is something divine. Nothing is better than being in love with someone. But why hating a day which reminds us about celebrating love our lives? Be it your spouse or kids. At its heart, on 14th February we celebrate the legacy of Saint Valentine of Rome, a second-century priest who was persecuted by the Roman Empire for serving Christians and refusing to quit his faith in Jesus. It is said that he was imprisoned for performing weddings for soldiers who were forbidden to marry, thus becoming the patron saint of love-struck couples. And this is the whole story behind this lovey dovey and highly misunderstood festival. As per legends, …

यही तो खूबी है कहानी की!

कहानी हिंदी में लेखन की एक विधा है. और अगर विकिपीडिया की माने तो ये बस उन्नीसवीं सदी में शुरू हुई थी. पर मुझे तो लगता है मनुष्य के जन्म के साथ ही साथ कहानी का भी जन्म हुआ और तभी से कहानी कहना तथा सुनना मानव का आदिम स्वभाव बन गया. बच्चो और कहानियो का नाता बड़ा पुराना रहा है. असल में बच्चे ही कहानियो को कहानी बनाते है. क्योंकि कहानी के चार तत्वो में से एक "प्रभाव" बच्चो पर ही सबसे ज्यादा देखा जा सकता है कहानी सुनने के बाद. बाकी के तीन कहानी के तत्व "रोचकता", "वक्‍ता" एवं "श्रोता" होते है. ये चार तत्व मिल कर कथावस्तु, पात्र, संवाद, वातावरण, भाषा-शैली तथा उद्देश्य निर्धारित करते है किसी कहानी का.
मुझे तो अपने बेटे का धय्न्वाद देगा होगा क्योंकि वो मेरे जीवन में कहानियो को फिर से ले आया. बड़े होने के साथ-साथ हमारा कहानियो के प्रति झुकाव बदलता जाता है. हम आसान से लगने वाले आख्यो से जटिल विषयो की तरफ जाने लगते है. पर जैसे ही कोई बच्चा आपके जीवन में उन पुरानी और आसान कहानियो को वापस ले आता है वैसे ही जीवन में एक सरलता महसूस होने लगती है. मुझे तो हुई है पूर…

For Gender Equality, Please Stop Saying These Things To Fathers

These days fathers are more involved in parenting than the fathers of any previous generation. An example is at my home only, my husband. He can do almost everything which I as a mother can do for our son. I really appreciate that he himself took charge of playing a pal of our parenting team. And this father-involvement has a directly proportional impact on kids as well. Studies have proved that kids whose fathers were involved 40 or more percentage in family’s care, showed better academic performance than kids whose fathers were less involved. Obviously, more involvement by a dad also means less pressure and dependence on mom. However, there is still a long path to cover. Despite of this change in fathers' nature, there exist families where males are proud breadwinners and females are theoretical housewives. I personally know few males who think non-working wives are better with kids. So why aren’t we closer to gender equality in the home? We have seen that our society plays a b…

कुछ टैक्स मज़ेदार भी होते है..

आम बजट आज वित्त मंत्री अरुण जेटली ने पेश किआ और उत्सुकता में मैंने पूरा सेशन सुना. मुझे इस बार का बजट महिलाओ के हिसाब से लगभग ठीक लगा. बजट के बारे में पढ़ते पढ़ते मुझे कुछ ऐसी चीजे भी मिली जिन्होंने मुझे काफी हँसाया. जैसे बजट पेश करने की शुरुआत अरुण जेटली जी ने एक शायरी से की : “इस मोड़ पर ना घबरा कर थम जाइये आप... जो बात नई है उसे अपनाइए आप.. डरते हैं नई राह पर चलने से क्यों.. हम आगे-आगे चलते हैं आइए आप ”


ऑफिस में लोग बेसब्री से टैक्स को लेकर होने वाले बदलाव का इंतज़ार कर रहे थे और उसके बारे में बातें कर रहे थे. बजट पर होने वाली कोई भी बात टैक्स की चर्चा के बिना अधूरी रहती है. सरकार जनता पर टैक्स लगाती है जिससे सरकार की जेब में पैसा आता है और उसी से देश चलता है. वो अलग बात है कि अभी के आकड़ो के हिसाब से बहुत कम लोग टैक्स दे रहे है अपने देश में. व्यवस्था चलाने के लिए पैसा जुटाने की यह तरीका बहुत पुराना है जिसका इतिहास खंगालने पर कई मजेदार चीजें मिलती हैं.
इंग्लैंड के सम्राट हेनरी अष्टम ने १५३५ में दाढ़ी पर टैक्स लगा दिया था. यह टैक्स आदमी की सामाजिक हैसियत के हिसाब से लिया जाता था. उसके …