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Showing posts from January, 2017

#MagicOfWarmth Kabhi-Kabhi pas aane ke liye..door jana hota hai!

“I’m blogging about my #MagicOfWarmth moment at BlogAddain association with Parachute Advansed Hot Oil

I once read that the best way to spell love is “T.I.M.E”. Unfortunately, time is something that many of us hard to find. Whether it's the time to spend with family or with kids, or with friends. Because of today’s fast lives, we live in a stressful and busy world where many of us are juggling full-time careers with looking after a family and home. However, we are informed people and many of us now recognize the importance of taking care of our mental and physical health. So we are also trying to squeeze in time for work-out routine and relaxation into our overstretched lives. But what about our relationship health? It doesn’t need any supporting fact to recognize that vacations improves family bonding and hence relationships. But there is certainly something to the mention that spending time together as a family, away from the stresses of the daily routine of work, office and dom…

कब होगा गणतंत्र हमारा ?

गणतंत्रबने ६७ साल हो गए है पर एक आज भी इस देख की स्त्री अपनी रचनात्मकता और बुद्धिमत्ता को दुनिया को दिखाने के बजाय खुद को बचाने में लगी है. वो रचनात्मकता जिसने इतिहास में भी कुछ पन्ने सिर्फ स्त्रियों के नाम किए है. वही रचनात्मकता आज स्त्रियों अपने आप को सड़को पर फिरने वाले मनचलो और घरो में रहने वाले रिश्तेदारो से बचाने में काम आ रही है. ६७ साल बहुत होते है किसी देश में बदलाव के लिए फिर भी स्त्रियों की दशा क्यों नही बदल पाई है जैसा हमारे संविधान में लिखा है? हर साल हम गणतंत्र-दिवस मनाने में लाखो रूपए खर्च कर रहे है पर वो पैसे स्त्रियों के लिए एक सुरखित देश बनाने में क्यों नही लगाए जा रहे है? पर सबसे बड़ा सवाल ये है की आज भी हम संविधान के पूरी तरह से लागू होने का इंतज़ार कर रहे है ऐसा क्यों है?



हमारे देख में आज भी कुछ लोगो के संविधान जैसी कोई चीज नही है. गरीबो, बाल मजदूरो और आदिवासियों का कोई पक्का संविधान नही है. स्त्रियों के लिए है तो भी वो मानने वाले कम ही है. इस विशाल गणतंत्र की चमक में हम स्त्रियों की आभा को किसने और कितना स्वीकारा है ये दिन रात हो रही घटनाओ से पता ही चल जाता है. आज भी…

ठिठुरता हुआ गणतंत्र : हरिशंकर परसाई

एक बार फिर हम गणतंत्र-दिवस मनाने जा रहे है है. हमारे गणतंत्र का उत्सव ठण्ड में आता है तो कई बार इसे ठिठुरते हुए देखना और मनना पड़ता है. पर असल में हमारे साथ हमारा गणतंत्र भी ठिठुर रहा है सदियो से. कारन जानने के लिए हरिशंकर परसाई का व्यंग्य पढ़िए ‘ठिठुरता हुआ गणतंत्र’ :

चार बार मैं गणतंत्र-दिवस का जलसा दिल्ली में देख चुका हूँ। पाँचवीं बार देखने का साहस नहीं। आखिर यह क्या बात है कि हर बार जब मैं गणतंत्र-समारोह देखता, तब मौसम बड़ा क्रूर रहता। छब्बीस जनवरी के पहले ऊपर बर्फ पड़ जाती है। शीत-लहर आती है, बादल छा जाते हैं, बूँदाबाँदी होती है और सूर्य छिप जाता है। जैसे दिल्ली की अपनी कोई अर्थनीति नहीं है, वैसे ही अपना मौसम भी नहीं है। अर्थनीति जैसे डॉलर, पौंड, रुपया, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा-कोष या भारत सहायता क्लब से तय होती है, वैसे ही दिल्ली का मौसम कश्मीर, सिक्किम, राजस्थान आदि तय करते हैं। इतना बेवकूफ भी नहीं कि मान लूँ, जिस साल मैं समारोह देखता हूँ, उसी साल ऐसा मौसम रहता है। हर साल देखने वाले बताते हैं कि हर गणतंत्र-दिवस पर मौसम ऐसा ही धूपहीन ठिठुरनवाला होता है। आखिर बात क्या है? रहस्य क्या है?…

Mr. Obama, An Extraordinary Family Person

President Barack Obama delivered his farewell speech to the nation in Chicago on 10th of January. Undoubtedly it was so powerful, thoughtful and inspiring. I don’t have much interest in the USA’s political conditions and the recent happenings. But I am so influenced by Mr. Barack Obama that I love to follow him. This made me listen to his farewell speech many times. And the best part about his speech was his love for his family. He shared his views on many other topics like democracy, race, changes and serving people. But my favorite part was when he addressed his wife and daughters. I have previously written how Mr. Barack Obama even being the president of the USA is an extraordinary family man. And that really makes his family special. I feel it’s necessary to quote what he said about his wife, Michelle, in his speech: “Michelle LaVaughn Robinson of the South Side, for the past 25 years you have not only been my wife and mother of my children, you have been my best friend. You took …

Why all educated women are not empowered?

It’s very natural and obvious that my favorite topic of reading these days is Women Empowerment. In lieu of this, I got to read something very inspiring last week and it was from an idol Kiran Bedi. Although after contesting Delhi’s election and losing it, I don’t find people admiring her much. However, I am a big fan of her. With her flawless work and powerful verdicts; she is able to prove herself as a true leader to follow. She is India’s first lady IPS officer and is currently working as LG of Puducherry. While attending the India Today Conclave South, Kiran Bedi spoke on why all educated women aren't empowered.  She has a different take on making women empowered in today’s society. She said, "Women are taught to be secure, whereas men are told to be courageous. Women aren't given the resources, finances, education or mobility to be confident enough to protect themselves”.
I completely second her thoughts. We have seen an improvement in society’s behavior towards edu…

पति नही जीवनसाथी बने..

एक दिन मैं अपने पतिदेव से कह रही थी कि आज कल ये टीवी के डेली soaps ने पत्नियों को दो तरीको से टाइपकास्ट कर दिया है. पहली मिसाल उन पत्नियों क़ी है जो पूरी तरीके से मासूम और सीधी हैं. वो किसी को जवाब नही दे सकती और ना ही किसी किसी की तीखी बातें सुन सकती हैं. हर बात पर या तो खुद को या फिर किस्मत को जिम्मेदार बना देती हैं. ऐसी पत्नियों के लिए पति अभी भी परमेश्वर है. वो मारे पीटे कुछ भी करे वो उफ़ भी नही करेंगी. जरुरत पड़े तो उसकी दूसरी या तीसरी शादी भी खुद ही करवा देंगी. यू कहे तो पूरी गाय है गाय. वही दूसरी मिसाल ऐसी पत्नियों क़ी है जो पूरी तरह से बही हुई है. उनके अजब गजब शौक है. वो घर में किसी क़ी इज्जत नही करती. और अगर पति क़ी करे भी तो पीठ पीछे कोई ना कोई शाजिश रचती रहती है. वो जेम्स बांड क़ी तरह गुंडे बदमाशो से भी लड़ लेती है और जरुरत पड़े तो उनसे काम भी करवा लेती है. पर इन दोनों टाइप्स के बीच की पत्नियों को किसी सीरियल में क्यों नही दिखाते? जो ना ज्यादा सीधी है और ना ज्यादा तेज. जिसे अपने परिवार क़ी ख़ुशी से मतलब है पर जिसे खुद को भी खुश करना पसंद है.

मुझे ऐसा लगता है कि समय के साथ अच्छी पत्नियो…

बचपन वाली धूप..

आज कल कड़ाके की ठण्ड है एनसीआर में, जो मुझे कम ही पसंद आती है. तो ऑफिस में मैं और मेरी दोस्त सौम्या दोनों लंच के बाद थोड़ी देर धूप लेने बाहर जाते है. खिली खिली धूप और रंग बिरंगे फूल देख कर मन खुश हो जाता है. ऑफिस जिस टावर में है उसकी मेंटेनन्स टीम ने चारो ओर अच्छा बगीचा बनाया है जो बैठने की मनाही होने से साफ सुथरा ही रहता है. बगीचों के साथ में चलने के लिए रास्ता बना है जिस पर हम दोपहर की धूप का मज़ा लेते है.  पिछले दिनों हम दोनों अपने अपने बचपन की धूप को याद कर रहे थे. पर अब धूप में वो मेरे बचपन वाली बात नही दिखती.

सच कहू तो बचपन में इस धूप की कोई कदर ही नही थी मुझे तो. जब बाहर जाने के लिए अम्मा मना कर देती थी कि "बाहर धूप है.." तो बड़ा गुस्सा आता था इस धूप पर. पर ठण्ड की बात अलग थी. ठण्ड में संडे का दिन पूरा बाहर ही गुजरता था मेरा. स्कूल की छुट्टी होती थी. सुबह नहा कर और जंगल बुक देख कर मैं और मेरी छोटी बहन दोनों धूप में बैठ जाते थे. फिर अम्मा मेरी पसंदीदा 'तहरी' बनाती थी मटर डाल कर. उधर ईस्ट UP  में सब्जियों वाले पुलाओ को तहरी बोलते है. मैं उनसे जिद करके अपनी प्लेट भी ब…

जमाना खराब नही होता..लोग खराब होते है..

घरकेबड़ेलोगकहतेहैजमानाबदलगयाहै.. याकहेकिजमानाखराबहोगयाहै. बेंगलुरुकीएमजीरोडऔरब्रिगेडरोडपरनएसालकेजश्नकेदौरानलड़कियोसेछेड़छाड़औरअभद्रतासेजुड़ाएकवीडियोसामनेआया. देखकर